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हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के दरबार में गूंजी भारत की साझी संस्कृति की रूह — बसंत पर्व बना एकता और मोहब्बत का पैग़ाम

हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के दरबार में गूंजी भारत की साझी संस्कृति की रूह — बसंत पर्व बना एकता और मोहब्बत का पैग़ाम

(सियासत का राज़ न्यूज – विशेष रिपोर्ट) (राशिद चौधरी) 
नई दिल्ली।
भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब और सूफ़ियाना परंपरा का जीवंत प्रतीक बसंत पर्व हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की ऐतिहासिक दरगाह में पूरे आध्यात्मिक उल्लास, प्रेम और आपसी सौहार्द के साथ मनाया गया। पीले रंग की छटा, सरसों के फूल, रूहानी क़व्वालियाँ और हर मज़हब के लोगों की मौजूदगी ने इस आयोजन को साझी संस्कृति का अनूठा उत्सव बना दिया।
दरगाह परिसर में जैसे ही बसंत की बहार उतरी, श्रद्धालु पीले परिधानों में सजकर हाज़िर हुए और सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार सरसों के फूल चढ़ाए। यह वही परंपरा है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलते हुए आज भी प्रेम, उम्मीद और नवजीवन का संदेश दे रही है। सूफ़ियाना संगीत की गूंज ने माहौल को इस क़दर रूहानी बना दिया कि हर दिल में मोहब्बत और भाईचारे की खुशबू फैल गई।
प्रख्यात क़व्वाल चाँद निज़ामी और हमसर हयात की दिलकश प्रस्तुतियों ने दरगाह के हर कोने को आध्यात्मिक रंग में रंग दिया। उनकी क़व्वालियों में शायरी, रहस्यवाद और इश्क़-ए-हक़ीक़ी इस तरह घुले कि श्रोता खुद को एक साझा रूहानी अनुभव का हिस्सा महसूस करने लगे।
दरगाह इंचार्ज सैयद काशिफ़ निज़ामी ने सियासत का राज़ से बातचीत में कहा,
“निज़ामुद्दीन में बसंत सिर्फ़ एक त्योहार नहीं, बल्कि एक पैग़ाम है — मोहब्बत, शांति और इंसानियत का। यहाँ आस्था हर दीवार से ऊपर उठकर दिलों को जोड़ती है।”
वहीं सैयद बिलाल निज़ामी ने बताया कि
“पिछले 750 वर्षों से हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के दरबार में बसंत मनाया जा रहा है और हमेशा बिना किसी धार्मिक भेदभाव के लोग यहाँ हाज़िरी देते आए हैं।”
इस मौके पर समाज के विभिन्न वर्गों और धर्मों से जुड़ी कई प्रमुख हस्तियाँ भी मौजूद रहीं, जिनमें फेस ग्रुप के चेयरमैन डॉ. मुश्ताक़ अंसारी, सोनम बेकर्स के CMD हाजी रियाज़ुद्दीन अंसारी, पत्रकार हाफ़िज़ गुफ़रान अफ़रीदी, सैफ़ुद्दीन शेख़, मुस्तफ़ा गुड्डू सहित अन्य गणमान्य लोग शामिल रहे।
आज के दौर में जब समाज में विभाजन और असहिष्णुता की बातें तेज़ होती जा रही हैं, निज़ामुद्दीन औलिया के दरबार में मनाया गया यह बसंत भारत की मिश्रित संस्कृति, सूफ़ी परंपरा और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की एक उजली मिसाल बनकर सामने आया।
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