धर्म से ऊपर देश, पहचान से ऊपर इंसानियत
जब एक आईपीएस अफ़सर की पंक्तियाँ बन गईं गंगा-जमुनी तहज़ीब की आवाज़
नई दिल्ली।— सियासत का राज़ | SKR NEWS
नफ़रत और बँटवारे के शोर के बीच अगर कहीं से इंसानियत की सच्ची आवाज़ उठती है, तो वह समाज के ज़मीर को झकझोर देती है। सुप्रीम कोर्ट सिक्योरिटी में तैनात आईपीएस अधिकारी जितेंद्र मणि की ये पंक्तियाँ आज सिर्फ़ शायरी नहीं, बल्कि हिंदुस्तान की आत्मा का ऐलान बन चुकी हैं।
“जब तक किसी के दिल में धड़कता है ये हिंदुस्तान,
मुझे फर्क नहीं पड़ता वो हिंदू हो या मुसलमान…”
ये अल्फ़ाज़ उस सोच को आईना दिखाते हैं, जो इंसान को धर्म के तराज़ू में तौलती है। आईपीएस जितेंद्र मणि का साफ़ संदेश है—पहले इंसान बनो, फिर किसी पहचान पर इतराओ।
उनकी रचना बताती है कि
कब्र और श्मशान का फर्क,
नाम और मज़हब की दीवारें,
हिंदू-मुसलमान की बहस—
सब उस वक़्त बेमानी हो जाती हैं, जब कफ़न तिरंगे में लिपटा हो।
“बस तिरंगे कफन रहे हो हिन्दू हो या मुसलमान…”
यह पंक्तियाँ उन जवानों को सलाम हैं, जो सरहदों पर खड़े होकर अपनी जान कुर्बान कर देते हैं, बिना ये सोचे कि उनका धर्म क्या है।
उनके लिए बस एक पहचान होती है—हिंदुस्तानी।
“वो शख़्स है अज़ीज़ जो सरहद का निगेहबान,
मुझे फर्क नहीं पड़ता वो हिंदू है या मुसलमान।”
आज जब समाज को ज़हर बाँटने की कोशिशें हो रही हैं, ऐसे में एक ज़िम्मेदार अफ़सर की कलम से निकले ये अल्फ़ाज़ देश के हर दिल को जोड़ने का काम करते हैं।
यह रचना हमें याद दिलाती है कि
👉 ईमान मज़हब में नहीं, इंसानियत में होता है।
👉 देश सबसे पहले आता है।
यह सिर्फ़ एक कविता नहीं—यह भारत की साझी रूह का बयान है।
एक ऐसी मिसाल, जिसे पढ़कर हर हिंदुस्तानी कहे—
“हाँ, यही है मेरा मुकम्मल हिंदुस्तान।”
— सियासत का राज़ | SKR NEWS