पारे से पानी में आलूदगी
(सियासत का राज़ न्यूज)
नई दिल्ली: जैसा कि हम सब जानते है कि पारा एक लिक्विड मेटल है, इसका इस्तेमाल कारखानों, खास तौर से थर्मामीटर की फैक्ट्रियों में और सोने की खानों में इस्तेमाल किया जा रहा है। मगर इंसान की सेहत और काम की जगहों के माहौल के बचाव की तरफ़ कोई ध्यान नहीं दिया गया पारा जब निकलता या गिरता है तो वो बड़ी तेज़ी से इधर उधर फैल जाता है। ये मिट्टी या पानी में पहुंच कर जानदारों को नुकसान पहुंचाता है। ख़ास तौर से मछलियों में दाख़िल हो जाता है,, इंसान मछलियों को खाता है और ये मछलियों के ज़रिए इंसानों के जिस्म में दाख़िल हो जाता है।
आलूदगी का बड़ा हुआ लेवल जो कि पीने के पानी में नहीं पाया जाता, अकार्बनिक परा तंत्रिका तंत्र को एफेक्ट कर सकता है। जिस से चिड़चिड़ापन, घबराहट, आंखों की रोशनी या सुनने में बदलाव, मेमोरी में कठिनाई जैसे सिम्पटम्स पैदा हो सकते है।
पारे के संपर्क यहां तक कि थोड़ी मिक़दार में गंभीर समस्याएं कर सकती है, और यह गर्भाशय में और शुरुआती दिनों में बच्चे के विकास के लिए खतरा है। पारा तंत्रिका, डाइजेशन और प्रतिरक्षा प्रणाली और फेफड़ों, स्किन और आंखों पर प्रभाव डाल सकता है।
पानी में पारा
एक हालिया मॉडल स्टडी के अनुसार समंदर में छोड़े गए कुछ मानव जनित पारा लगभग 80,000 से 45,0000 मीट्रिक टन होने का अनुमान है और इस मात्रा को दो तिहाई हिस्सा 1000 मीटर से अधिक उथले पानी में पाए जाने का अनुमान जहां बहुत अधिक मछलियां रहती है। पारा अत्यधिक Methyl mercury के रूप में खाद्य श्रृंखलाओं जैव संचित हो सकता है। आंकड़ों के मुताबिक, वैश्विक मछली की खपत का लगभग 66 फीसद हिस्सा समंदर से आता है इसलिए, समंदर के पारे के लेवल की निगरानी और विनियमन करना इंपॉर्टेंट है ताकि समंदर भोजन के सेवन के ज़रिए से अधिक से अधिक पारे को मानव आबादी तक पहुंचने से रोका जा सके। पारे के कारण होने वाला प्रदूषण भारत में बहुत व्यापक नहीं है लेकिन महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा तथा उड़ीसा जैसे स्टेट्स में कुछ ऐसे क्षेत्र है, जहां से पानी में पारा खतरनाक पॉल्यूशन के साथ पाया गया है। खदान क्षेत्रों तथा चमड़ा उद्योग जो पारा निर्माण करते है, के आस पास पानी के निकाय, प्रदूषण प्रवण है।
समन्दर की सतह से अधिक बढ़ा पारा। समन्दर में पारा अधिक जहरीले methyl murcury के रूप में मछलियों में जमा हो जाता है। इंसानों के जरिए मछलियों का सेवन करने पर यह बच्चों में ब्रेन का विकास, और बड़ों में दिल की बीमारी को पैदा कर सकता है।
दुनिया भर में उद्योगों द्वारा वायु मंडल में छोड़ा गया अकार्बनिक पारे का मानव शक्ति उत्सर्जन प्राकृतिक उत्सर्जन से पांच से दस गुना अधिक है। इस तरह सतही समुंदर के पानी में अकार्बनिक पारे की मिक़दार तीन गुना से अधिक बढ़ गई है।
अगर पारा जिस्म में चला जाए तो किया होगा।
पारा अगर किसी इंसान के जिस्म में चला जाए तो उसकी जान पर बन सकती है। पेट में पारा जाने से उल्टियां आएंगी और हैजा हो सकता है। इसके अलावा जी का मचलाना, पेट में तेज दर्द भी हो सकता है। अगर थर्मामीटर का इस्तेमाल किया जाता है तो इसमें सावधानी बरतने की सख्त जरूरत है।
पानी में पारे की वजह से रोग
पानी में पारे की वजह से मीनामाता रोग होता है। मीनामाता रोग को Chiso मिनीमाता नाम से भी जानते है। मिनीमाता रोग का लक्षण गति भंग, हाथ पैरों और अन्य अंगों का सुन्न होना, मांस पेशियों में कमजोरी आदि है। इसके अलावा कुछ मामलों में ये पागलपन और कोमा तक भी पहुंच जाता है। ये बीमारी मैथिल मर्करी पॉयजनोस है जो। मनुष्यों में उत्पन्न होती है जब वे दूषित मछलियों और शंख का सेवन करते है।
Minmata रोग का इलाज
Minmata रोग के कुछ लक्षणों का इलाज संभव है लेकिन इस बात पर डिपेंड करता है कि इंसान परे के संपर्क में कितना आया है। न्यूरोलॉजिकल प्रभाव से उत्पन्न होने वाले लक्षण प्रतिवर्ती नहीं होते।
मनुष्यों और जानवरों दोनों की पॉयजनोस और परिणाम मौतें छब्बीस वर्षों तक रही जब की Chuso aur Kumamoto Prefectural सरकार ने महामारी को रोकने के लिए कुछ नहीं किया।
मीनामाता रोग के लिए रोग निरोध उपाय, पारा उच्च हाईली पोल्यूटेड मछलियों को कम पकड़ा जाए या समाप्त कर के मीनामत रोग को रोका जा सकता है।
1 May 1956 को जापान में एक डॉक्टर न, केंद्रीय तंत्रिका तंत्र एक अज्ञात बीमारी की सूचना दी, जो मीनामाता रोग की आधिकारिक खोज थी। भारत का कानून पारे को बाहर से मांगने की परमिशन देता है हालांकि ये साबित हो चुका है कि पारा महौलियत में आलूदगी फैलाने का जिम्मेदार है भारत आने वाले पारे के जहाजों के जरिए मनुष्य का स्वास्थ्य, पर्यावरण और अर्बन और रूरल क्षेत्रों को बहुत ज्यादा खतरा पैदा हो रहा है जिसकी तरफ ध्यान देना जरूरी है। डेवलप्ड देशों में आम लोगों की जिंदगी और पर्यावरण को इस खतरे से बचाने के मुनासिब इंतजाम मौजूद नहीं है। भारत को चाहिए वो वर्ल्ड बैंक से इस खतरनाक पदार्थ को हिफाजत के साथ उपयोग करने और उस पर काबू रखने की तकनीक अपने प्रभावित क्षेत्रों में लगाएं। अमेरिका के वैज्ञानिकों ने अंदाजा लगाया है कि 30 से 70 फीसद पारे की मात्रा हमारे पर्यावरण में शामिल हो जाती है और वो फिर पानी और मछलियों के पेट में जमा हो जाती है।
इस प्रदूषण के खिलाफ आवाज उठाना जरूरी है।
डॉ रवींद्र कुमार